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बुधवार, 30 नवंबर 2011

"दोहे-साझा ब्लॉग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


किया आपने था जिसे, मन से अंगीकार।
अब करते क्यों उसी से, सौतेला व्यवहार।१।

जिस चिट्ठे के साथ में, जुड़ा आपका नाम।
उस पर भी तो कीजिए, निष्ठा से कुछ काम।२।

लेखन के संसार में, चलना नहीं कुचाल।
जो सीधा-सीधा चले, होता वो खुशहाल।३।

सोच-समझ कर ही सदा, यहाँ बनाओ मित्र।
मन के मन्दिर में सदा, रक्खो उनके चित्र।४।

बिना नम्रता के सभी, होते दुष्कर काम।
अहमभाव से कभी भी, मिलता नहीं इनाम।५।

19 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर ..उत्तम विचार और सत्य्वचन .. सुन्दर दोहे..

    जवाब देंहटाएं
  2. ्दोहे तो बहुत सुन्दर है और अच्छी सीख भी दे रहे है मगर मामला क्या है?

    जवाब देंहटाएं
  3. सारे साझा संस्थानों की यही समस्या है।

    जवाब देंहटाएं
  4. क्या बात है,
    बहुत सुंदर
    शानदार संदेश भी दे रहे हैं।

    जवाब देंहटाएं
  5. सुन्दर दोहे शानदार संदेश.....

    जवाब देंहटाएं
  6. बिना नम्रता के सभी, होते दुष्कर काम।
    अहमभाव से कभी भी, मिलता नहीं इनाम।।

    सुन्दर शिक्षाप्रद दोहे रचे हैं सर...
    सादर///

    जवाब देंहटाएं
  7. kya baat kahi hai sir ,lakh take ki ek batt,sahridayata ki sundar mishal.. shukriya ji

    जवाब देंहटाएं
  8. सुंदर संदेश देती शिक्षाप्रद दोहे,...

    नए पोस्ट "प्रतिस्पर्धा"में इंतजार है,..

    जवाब देंहटाएं
  9. शास्त्री जी आज तो आभार के लिए भी शब्द कम पड़ जाएंगे। लगता है आप ज्योतिष हैं और मेरे मन की बातें यहां नोट कर दी है --

    किया आपने था जिसे, मन से अंगीकार।
    अब करते क्यों उसी से, सौतेला व्यवहार।१।
    यह पहला दोहा मेरे द्व्वारा कुछ मित्रों को ...

    जिस चिट्ठे के साथ में, जुड़ा आपका नाम।
    उस पर भी तो कीजिए, निष्ठा से कुछ काम।२।
    यह दूसरा दोहा आपके द्वारा मेरे लिए ...

    लेखन के संसार में, चलना नहीं कुचाल।
    जो सीधा-सीधा चले, होता वो खुशहाल।३।
    अहा ... यह सबके द्वारा सबके लिए ...

    सोच-समझ कर ही सदा, यहाँ बनाओ मित्र।
    मन के मन्दिर में सदा, रक्खो उनके चित्र।४।
    यह तो सबसे बड़ी सीख आपके द्वारा मेरे लिए।

    जवाब देंहटाएं
  10. आदरणीय मनोज कुमार जी की टिप्पणियाँ मेरे मेल बॉक्स में तो दिखाई देती हैं मगर ब्लॉग पर नहीं आ रहीं हैं !
    --
    मनोज कुमार ने आपकी पोस्ट " "दोहे-साझा ब्लॉग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मय... " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    शास्त्री जी आज तो आभार के लिए भी शब्द कम पड़ जाएंगे। लगता है आप ज्योतिष हैं और मेरे मन की बातें यहां नोट कर दी है --

    किया आपने था जिसे, मन से अंगीकार।
    अब करते क्यों उसी से, सौतेला व्यवहार।१।
    यह पहला दोहा मेरे द्व्वारा कुछ मित्रों को ...

    जिस चिट्ठे के साथ में, जुड़ा आपका नाम।
    उस पर भी तो कीजिए, निष्ठा से कुछ काम।२।
    यह दूसरा दोहा आपके द्वारा मेरे लिए ...

    लेखन के संसार में, चलना नहीं कुचाल।
    जो सीधा-सीधा चले, होता वो खुशहाल।३।
    अहा ... यह सबके द्वारा सबके लिए ...

    सोच-समझ कर ही सदा, यहाँ बनाओ मित्र।
    मन के मन्दिर में सदा, रक्खो उनके चित्र।४।
    यह तो सबसे बड़ी सीख आपके द्वारा मेरे लिए।

    जवाब देंहटाएं
  11. guru ji....angikaar shabd se mujhe yaad aayaa...hamari gurbaani mein ek bandish hai....

    angikaaroh kare tera kaaraj sabb sawaarna!!

    जवाब देंहटाएं
  12. शिक्षापूर्ण विचारों से ओत-प्रोत दोहे,सादर आभार.

    जवाब देंहटाएं
  13. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-715:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

    जवाब देंहटाएं

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