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शनिवार, 9 मई 2015

दोहे "मातृ-दिवस" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मातृ-दिवस पर माँ को प्रणाम करते हुए 
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पैंसठ वर्षों तक मिला, माँ का प्यार-दुलार।
माँ तुझ बिन सूना लगे, अब मुझको संसार।।

होता है धन-माल से, कोई नहीं सनाथ।।
सिर पर होना चाहिए, माता जी का हाथ।।
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जिनके सिर पर है नहीं, माँ का प्यारा हाथ।
उन लोगों से पूछिए, कहते किसे अनाथ।।
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लालन-पालन में दिया, ममता और दुलार।
बोली-भाषा को सिखा, करती माँ उपकार।।
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जगदम्बा के रूप में, रहती है हर ठाँव।
माँ के आँचल में सदा, होती सुख की छाँव।।
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सुख-दुख दोनों में रहे, कोमल और उदार।
कैसी भी सन्तान हो, माँ देती है प्यार।।
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होता माता के बिना, यह संसार-असार।
एक साल में एक दिन, माता का क्यों वार।।
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करते माता-दिवस का, क्यों छोटा आकार।
प्रतिदिन करना चाहिए, माँ से प्यार अपार।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा रविवार ( 09-05-2021) को
    "माँ के आँचल में सदा, होती सुख की छाँव।। "(चर्चा अंक-4060)
    पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित है.धन्यवाद

    "मीना भारद्वाज"

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  2. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  3. मातृ दिवस पर सुंदर प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  4. आप जल्द स्वस्थ हो घर लौटें यही प्रभु से विनती है !

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं
  6. 'जिनके सिर पर है नहीं, माँ का प्यारा हाथ।
    उन लोगों से पूछिए, कहते किसे अनाथ।'
    - सच में उन के बचपन की सिसक अब भी मन में कहीं उमड़ आती होगी.

    जवाब देंहटाएं
  7. जी बहुत बढ़िया लिखा है आपने।
    "अनाथ" पर मेरी कुछ पंक्तियां...

    माँ पर लिखी हर एक रचना माँ है....
    माँ से कुछ भी ना छुपा है।
    माँ किसी की हो, या ना हो....
    माँ की ममता से कोई वंचित ना रह पाया है।
    -PRAKASH SAH

    जवाब देंहटाएं

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