-- होश गुम हैं, जोश है मन में भरा। प्यार के परिवेश की सूखी धरा।। चल पड़ा है दौर कैसा, हर बशर मगरूर है, आदमी की आदमीयत आज चकनाचूर है, हाट में मिलता नहीं सोना खरा। प्यार के परिवेश की सूखी धरा।। खो गया है गाँव का वातावरण, हो गया दूषित शहर का आवरण, जी रहा इंसान होकर अधमरा। प्यार के परिवेश की सूखी धरा।। अब नहीं मासूम लगता कोई बालक, हो गया मजबूर जग को आज पालक, मिट गया है जिन्दगी का आसरा। प्यार के परिवेश की सूखी धरा।। लाज का बदला हुआ पर्याय है, वासना का अब शरू अध्याय है, गीत ने पहना रुपहला घाघरा। प्यार के परिवेश की सूखी धरा।। लीलता ऋतुराज को अब कौन है, कोकिला मधुमास में भी मौन है, हो गया है ज्ञान कितना बावरा। प्यार के परिवेश की सूखी धरा।। -- |
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |

सदा स्वस्थ, प्रसन्न रहें
जवाब देंहटाएं