-- मूर्खदिवस हो रहे, भद्दे आज मजाक। |
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जवाब देंहटाएंजी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (०२-०४-२०२३) को 'काश, हम समझ पाते, ख़ामोश पत्थरों की ज़बान'(चर्चा अंक-४६५२) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
हमेशा की तरह पैने और चुटीले दोहे...शात्री की का सतत लेखन बहुत प्रभावित करता है...बहुत ख़ूब...🙏🙏🙏
जवाब देंहटाएंआदरणीय डॉ साहब को मुझ मुर्ख का भावभीना प्रणाम !
जवाब देंहटाएंमुर्ख दिवस की बधाई तो नहीं दी जा सकती , ना ही "ये दिन आये बार बार। ... " वगैरह कहा जा सकता है !
अलबत्ता , मूर्खता एक ही दिन हो पुरे साल में। .... यही सन्देश देती आपकी सदा मनभावन दोहावली का अभिनन्दन
जय श्री राम !
अत्यंत सुंदर
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