मीत का साथ निभाओ तो कोई बात बने।
गीत में साज बजाओ तो कोई बात बने।। एक दिन मौज मनाने से क्या भला होगा? रोज दीवाली मनाओ तो कोई बात बने। इन बनावट के उसूलों में धरा ही क्या है? प्रीत हर दिल में जगाओ तो कोई बात बने। क्यों खुदा कैद किया दैर-ओ-हरम में नादां, रब को सीने में सजाओ तो कोई बात बने। सिर्फ पुतलों के जलाने से फायदा क्या है? दिल के रावण को जलाओ तो कोई बात बने।
“रूप” की धूप रहेगी न सलामत नादां,
इश्क का ध्यान लगाओ तो कोई बात बने।
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क्यों खुदा कैद किया दैर-ओ-हरम में नादां,
जवाब देंहटाएंरब को सीने में सजाओ तो कोई बात बने।
...बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति...
करना तो वही था, जब उसे नहीं जला पाते हैं तो पुतला जला लेते हैं।
जवाब देंहटाएंबहुत सटीक गजल, शुभकामनाएं.
जवाब देंहटाएंरामराम.
सिर्फ पुतलों के जलाने से फायदा क्या है?
जवाब देंहटाएंदिल के रावण को जलाओ तो कोई बात बने।
बहुत खूब,कमाल की सार्थक प्रस्तुति,,,
RECENT POST : अपनी पहचान
बहुत सुन्दर है .माया रावण के राज में किस किस को ...जलावोगे .पूरी फसल सरकंडे की तरह जलानी पड़ेगी .माया सर्व व्यापी है .
जवाब देंहटाएंवाह !
जवाब देंहटाएंएक दिन मौज मनाने से क्या भला होगा?
जवाब देंहटाएंरोज दीवाली मनाओ तो कोई बात बने।
बहुत सुंदर ..मधुर रचना !!
aap aise hee likhte jaao to baat bane
जवाब देंहटाएंक्या बात है -
जवाब देंहटाएंआभार गुरु जी -
सार्गभित, प्रशंसनिये.
जवाब देंहटाएंसारगर्भित
जवाब देंहटाएंबढिया रचना
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
रोज दीवाली मने और दिल का रावण जले...सुंदर बात !
जवाब देंहटाएंवाह बहुत बढिया
जवाब देंहटाएंबहुत बढिया
जवाब देंहटाएंसिर्फ पुतलों के जलाने से फायदा क्या है?
जवाब देंहटाएंदिल के रावण को जलाओ तो कोई बात बने। सुन्दर रचना शास्त्रीजी सहमत हूँ आपसे .साथ ही यह भी पूछना चाहूँगा
जो जीते भी कर भी कुछ न कर सके उन पुतलों को भी लगाने से फायदा क्या है,
परेशानी का सबब बनने को जो नित चौराहों पर आ खड़े हो जाते हैं,