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सोमवार, 29 जुलाई 2019

ग़ज़ल "राह में चलते-चलते" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


भटकना नहीं, राह में चलते-चलते
रपटना नहीं, राह में चलते-चलते

मंजिल सभी को है चलने से मिलती
ठहरना नहीं, राह में चलते-चलते

रखना नजर प्यार की मुख़्तसर सी
भड़कना नहीं, राह में चलते-चलते

सफर काट लो अपना राजी-खुशी से
झगड़ना नहीं, राह में चलते-चलते

धीरज न खोना कठिन रास्तों में
पिछड़ना नहीं, राह में चलते-चलते

अस्मत की गठरी बचा करके रखना
सँवरना नहीं, राह में चलते-चलते

हाट में रूप के मत कदम को बढ़ाना
भटकना नहीं, राह में चलते-चलते

2 टिप्‍पणियां:

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