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बुधवार, 11 सितंबर 2019

दोहे "अँगरेजी का रंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


अँगरेजी से कीजिए, भारत में वैराग्य।
हिन्दी-हिन्दुस्तान का, होगा तब सौभाग्य।।
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भाषा होनी चाहिए, एक देश में एक।
संविधान कहता यही, नीयत रक्खो नेक।।
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किस कारण से आज भी, इँगलिश रहे सहेज।
अँगरेजी भी छोड़ दो, चले गये अँगरेज।।
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अपनी भाषा में करो, अपने सारे काज।
अँगरेजी का देश से, दूर करो अब राज।।
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हिन्दी के परिवेश में, छिड़ी हुई है जंग।
आज सियासत में चढ़ा, अँगरेजी का रंग।।
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देवनागरी कर रही, अब भी यही गुहार।
अँगरेजी को आज भी, ढोती क्यों सरकार।।
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बहुमत मिला प्रचण्ड जब, फिर क्यों हो मजबूर।
अँगरेजी को कीजिए, भारत से अब दूर।।
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