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शनिवार, 14 सितंबर 2019

दोहे "हिन्दी है परतन्त्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रटे-रटाये शब्द हैं, घिसे-पिटे हैं वाक्य।
अँगरेजी करने लगी, हिन्दी का शालाक्य।।
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कहने को स्वतन्त्र हैं, लेकिन स्व स्वर्गीय।
देवनागरी रह गयी, पुस्तक में पठनीय।।
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अँगरेजी की कैद में, हिन्दी है परतन्त्र।
अपनी भाषा के लिए, तरस रहा जनतन्त्र।।
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बिगड़ गयी है वर्तनी, नहीं लिखाई ठीक।
भटक रही है देश में, हिन्दी की तकनीक।।
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मास सितम्बर में रहे, हिन्दी का उजियार।
बाकी पूरे सालभर, रहता है अँधियार।।
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नहीं सार्थक है अभी, आजादी का मन्त्र।
मीलों-कोसों दूर है, जनता से जनतन्त्र।।
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ऋषि-मुनियों के देश में, हिन्दी को वनवास।
अपनी भाषा के बिना, भारत देश उदास।।
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