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सोमवार, 9 सितंबर 2019

गीत "तुकबन्दी से खिलता उपवन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

तुकबन्दी से खिलता उपवन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन
--
शब्दों को मन में उपजाओ
फिर इनसे कुछ वाक्य बनो
सन्देशों से खिलता गुलशन
स्वर व्यञ्जन ही तो है जीवन

--
तुकबन्दी मादक-उन्मादी
बन्धन में कैसी आजादी 
सुख बरसाता रहता सावन 
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन
--
आता नहीं बुढ़ापा जिसको
तुकबन्दी कहते हैं उसको
कविता होती है चिरयौवन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन
--
दुर्जन के प्रति भरो निरादर
महामान्य का करना आदर
तुकबन्दी से होता वन्दन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन
--
तुकबन्दी मनुहार-प्यार है
 यह महकता हुआ हार है
तुकबन्दी होती चन्दन-वन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन
--
शायर की यह गीत–ग़ज़ल है
सरिताओं की यह कल-कल है
योगी-सन्यासी का आसन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन
--
तुकबन्दी बिन जग है सूना
यही उदाहरण, यही नमूना
तुकबन्दी में है अपनापन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन
--
तुकबन्दी बिन काव्य अधूरा
मज़ा नहीं मिलता है पूरा
तुकबन्दी से होता गायन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन
--
अगर शान से जीना चाहो
तुकबन्दी को ही अपनाओ
खोलो तो मुख का वातायन
स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन
--

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत दुन्दर गीत ...
    नया अंदाज़ ...

    जवाब देंहटाएं
  2. तुकबंदी से तुकबंदी तक बहुत अच्छी तुकबंदी की शास्त्री जी, बहुत खूब

    जवाब देंहटाएं

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