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शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

दोहे "सोच अरे नादान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


वृद्धाश्रम में भेज कर, किया अनोखा काम।
आज कुपुत्रों ने किया, ममता को बदनाम।।
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बड़े बुजुर्गों को किया, उनके घर से दूर।
मात-पिता के कर दिये, सारे सपने चूर।।
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लालन-पालन पिता का, भूले माँ का प्यार।
पुत्रों ने माँ-बाप का, छीन लिया संसार।।
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पोते-पोती के नहीं, दादा रहे करीब।
कलियुग में परिवार का, खोटा हुआ नसीब।।
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माना बच्चों के लिए, साधन सब मौजूद।
दादा-दादी का मगर, धूमिल हुआ वुजूद।।
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भूल गये अपना समय, बचपन का वो लाड़।
बूढ़े-बरगद छाँटकर, गुलशन किया उजाड़।।
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उनके सारे कृत्य को, देख रही सन्तान।
अपने भूत-भविष्य को, सोच अरे नादान।।
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