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शनिवार, 21 मार्च 2020

ग़ज़ल "साँस की सरगम सुनाता जा रहा हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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जिन्दगी के गीत गाता जा रहा हूँ
साँस की सरगम सुनाता जा रहा हूँ
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पाँव बोझिल हैं थकी है पीठ भी
बोझ जीवन का उठाता जा रहा हूँ
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मिल गया जो भी नजराना मुझे
शान से उसको लुटाता जा रहा हूँ
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उम्र अब कितनी बची है क्या पता
घोंसला फिर भी बनाता जा रहा हूँ
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कुछ पुराने साज दामन में समेटे
सादगी से सुर सजाता जा रहा हूँ
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है अमावस ज्ञान का पसरा अँधेरा
आस का दीपक जलाता जा रहा हूँ
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मैं उजड़ते बाग का बूढ़ा शजर हूँ
फर्ज को अपने निभाता जा रहा हूँ
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उस बुलन्दी के बचे जो भी निशां
खैर मैं उनकी मनाता जा रहा हूँ
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जिन्दगी के जलजलों की उलझनों में
'रूप' की शतरँज बिछाता जा रहा हूँ
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8 टिप्‍पणियां:

  1. जिन्दगी के जलजलों की उलझनों में
    'रूप' की शतरँज बिछाता जा रहा हूँ
    बहुत ख़ूब

    आध्यात्म और दर्शन को ग़ज़ल के जरिए बख़ूबी बयां किया है आपने 🙏

    जवाब देंहटाएं
  2. मैं उजड़ते बाग का बूढ़ा शजर हूँ
    फर्ज को अपने निभाता जा रहा हूँ
    वाह!!!
    क्या बात....
    लाजवाब गजल।

    जवाब देंहटाएं
  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार(२२-०३-२०२०) को शब्द-सृजन-१३"साँस"( चर्चाअंक -३६४८) पर भी होगी
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का
    महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    **
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  4. कुछ पुराने साज दामन में समेटे
    सादगी से सुर सजाता जा रहा हूँ।
    वाह!!
    बहुत उम्दा/बेहतरीन ग़ज़ल ।

    जवाब देंहटाएं
  5. कुछ पुराने साज दामन में समेटे
    सादगी से सुर सजाता जा रहा हूँ
    बहुत खूब !!
    अत्यन्त सुन्दर गज़ल ।

    जवाब देंहटाएं
  6. जिन्दगी के गीत गाता जा रहा हूँ
    साँस की सरगम सुनाता जा रहा हूँ

    बहुत खूब... सर ,सादर नमस्कार

    जवाब देंहटाएं

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