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शनिवार, 21 मार्च 2020

दोहे "घोर संक्रमित काल में, मुँह पर ढको नकाब" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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कोरोना से मच रहा, जग में हाहाकार।
एतिहात सबसे बड़ा, ऐसे में उपचार।।
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सेनीटाइज से करो, स्वच्छ सभी घर-बार।
बन्द कीजिए कुछ दिवस, अपने कारोबार।।
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नहीं आ सका है अभी, कोरोना का तोड़।
अपने घर में ही रहो, भीड़-भाड़ को छोड़।।
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खाना अब तो छोड़ दो, मछली गोश्त-कबाब।
घर से निकलो जब कभी, मुँह पर ढको नकाब।।
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कोरोना से देश में, पसरा है अवसाद।
भूल जाइए आज सब, धरने और फसाद।।
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जन-जीवन से खेलते, अभिमानी मुल्लाह।
हुआ बाग शाहीन है, कितना लापरवाह।।
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घोर संक्रमित काल में, मत कर टाल-मटोल।
बार-बार मिलता नहीं, ये जीवन अनमोल। 
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5 टिप्‍पणियां:

  1. घोर संक्रमित काल में, मत कर टाल-मटोल।
    बार-बार मिलता नहीं, ये जीवन अनमोल।
    बहुत सुन्दर और सार्थक सृजन सर ।

    जवाब देंहटाएं
  2. आपके दोहे मनमोह लेते हैं और सोचने पर व‍िवश भी करते हैं शास्त्री जी , बहुत खूबसूरती से आपने समसामय‍िक ट‍िप्पण‍ियां की हैं

    जवाब देंहटाएं
  3. सामायिक विषय पर ज्ञान और निर्देश देते सार्थक दोहे आदरणीय।

    जवाब देंहटाएं
  4. आज की प्रस्तुति भूमिका से आखिर तक सामायिक और सार्थक।
    आज की परिस्थितियों से निपटने में सभी को साथ मिल कदम उठाने होंगे।
    सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई।
    मेरी रचना को शामिल करने केलिए हृदय तल से आभार।

    जवाब देंहटाएं
  5. सेनीटाइज से करो, स्वच्छ सभी घर-बार।
    बन्द कीजिए कुछ दिवस, अपने कारोबार।।
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    नहीं आ सका है अभी, कोरोना का तोड़।
    अपने घर में ही रहो, भीड़-भाड़ को छोड़।
    वाह ! वाह ! गुरु जी |

    जवाब देंहटाएं

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