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सोमवार, 23 मार्च 2020

दोहे "जनहित के कानून को, कभी न करना भंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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कोरोना को देख कर, बना रहे जो बात।
वो ही देश-समाज को, पहुँचाते आघात।।
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अच्छे कामों का जहाँ, होने लगे विरोध।
आता देश समाज को, ऐसे दल पर क्रोध।।
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मुखिया जिस घर में नहीं, होता है दमदार।
समझो उस परिवार का, निश्चित बण्टाधार।। 
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मुखिया ने मझधार में, छोड़ी जब पतवार।
तब से ही वो समर में, झेल रहा है हार।।
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देशभक्ति के मत करो, रंग आज बदरंग।
जनहित के कानून को, कभी न करना भंग।।
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अपने स्वारथ के लिए, करो न ओछे काम। 
रात हमेशा भोर का, लाती है पैगाम।।
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करो बाग शाहीन में, धरना अब तो बन्द।
अपने ही घर में रहो, होकर सब सानन्द।।
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5 टिप्‍पणियां:

  1. ''कोरोना को देख कर, बना रहे जो बात। वो ही देश-समाज को, पहुँचाते आघात।।''
    ऐसे पूर्वाग्रही, अहमी लोगों को सबसे पहले शास्ति मिलनी चाहिए

    जवाब देंहटाएं
  2. अपने स्वारथ के लिए, करो न ओछे काम।
    रात हमेशा भोर का, लाती है पैगाम।।
    बहुत सुन्दर और सार्थक संदेश आदरणीय .

    जवाब देंहटाएं
  3. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (24 -3-2020 ) को " तब तुम लापरवाह नहीं थे " (चर्चा अंक -3650) पर भी होगी,

    आप भी सादर आमंत्रित हैं।

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    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही सुंदर दोहे आदरणीय सर

    जवाब देंहटाएं

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