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शुक्रवार, 20 मार्च 2020

दोहे "विश्व गौरैया दिवस" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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खेत और खलिहान में, दूषित हुआ अनाज।
लुप्तप्राय सी हो गयी, गौरैया है आज।।
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शहरी जीवन में नहीं, रहा आज आनन्द।
गौरैया को है नहीं, वातावरण पसन्द।।
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मौसम मेरे देश के, हुए आज विकराल।
गौरैया का गाँव में, पड़ने लगा अकाल।।
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लगे डालने खेत में, खाद विषैली लोग।
इसीलिए फैले हुए, भाँति-भाँति का रोग।।
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जहरीला खाना हुआ, जहरीला है नीर।
देश और परिवेश की, हालत है गम्भीर।।
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पेड़ काटता जा रहा, धरती का इंसान।
इसीलिए आने लगे, चक्रवात-तूफान।।
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नंगे होते जा रहे, हरे-भरे अब शैल।
पावन गंगा नीर में, बहता है अब मैल।।
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आबादी बढ़ने लगी, सीमित हुई जमीन।
रोजगार कैसे मिलें, करती काम मशीन।।
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11 टिप्‍पणियां:

  1. गौरैया की चहचहाहट अब अतीत की बात बनती जा रही है, सामयिक रचना !

    जवाब देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक कीचर्चा शनिवार(२१-०३-२०२०) को "विश्व गौरैया दिवस"( चर्चाअंक -३६४७ ) पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  4. गौरैया दिवस पर लाजवाब दोहे।

    जवाब देंहटाएं
  5. गौरैया को समर्पित बहुत ही सुंदर रचना ,सादर नमन सर

    जवाब देंहटाएं
  6. सामायिक समस्या पर ध्यान आकर्षित करते सुंदर दोहे।

    जवाब देंहटाएं

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