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शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

शुभ दीपावली "दीपों का त्यौहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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मनमोहक सबको लगें, झालर-बन्दनवार।
जगमग करती रौशनी, सजे हुए बाजार।।
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काजू मन ललचा रहे, महँगे हैं बादाम।
लेकिन श्रमिक-किसान की, नहीं जेब में दाम।।
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धनवानों के है लिए, दीपों का त्यौहार।
जुआ खेलते शान से, जीत रहे या हार।।
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बाजारों में धान का, गिरा हुआ है भाव।
धरती के भगवान के, घर में बहुत अभाव।।
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जो दुनिया को पालता, बदतर उसका हाल।
औने-पौने दाम में, उसका बिकता माल।।
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चाहे अपने देश में, कोई हो सरदार।
नहीं किसानों का बना, अब तक पैरोकार।।
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जितने जनसेवक हुए, निकले सब मक्कार।
करते हैं मत के लिए, भाषण लच्छेदार।।
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उनकी है दीपावली, उनके सब त्योहार।
लेकिन जनता झेलती, महँगाई की मार।।
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8 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (१४-११-२०२०) को 'दीपों का त्यौहार'(चर्चा अंक- ३८८५) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर।
    दीपावली की आपको एवं आपके पूरे परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं।

    जवाब देंहटाएं
  4. दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाओं के संग वन्दन

    जवाब देंहटाएं
  5. चाहे अपने देश में, कोई हो सरदार।
    नहीं किसानों का बना, अब तक पैरोकार।।
    --
    जितने जनसेवक हुए, निकले सब मक्कार।
    करते हैं मत के लिए, भाषण लच्छेदार।।

    आदरणीय,
    एकदम यथार्थ स्थिति का चित्रण किया है आपने अपने दोहों के माध्यम से। साधुवाद 🙏🌟🙏

    दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएं 🌺🍁🌺
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं
  6. नमस्ते
    आपको दीपावली सपरिवार शुभ और मंगलमय हो।

    जवाब देंहटाएं

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