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रविवार, 8 नवंबर 2020

गीत "पुराना गाँव-नीम की छाँव" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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जाने कहाँ खो गया अपनाआज पुराना गाँव।
नहीं रही अपने आँगन मेंआज नीम की छाँव।।
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घर-घर में हैं टैलीवीजिनसूनी है चौपाल,
छाछ-दूध-नवनीत न भाताचाय पियें गोपाल,
भूल गये नाविक के बच्चे, आज चलानी नाव।
नहीं रही अपने आँगन मेंआज नीम की छाँव।।
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पहले जैसा निश्छल बचपन, नहीं दिखाई देता,
मन्दिर में अब कथा-कीर्तन, नहीं सुनाई देता,
पूजा-पध्दति की सी.डी. ने, तोड़ दिये हैं पाँव।
नहीं रही अपने आँगन मेंआज नीम की छाँव।।
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नहीं रहे अब खेल पुराने, दंगल-कुश्ती भूले,
जिम में जाकर अब यौवन के हाथ-पाँव हैं फूले,
मस्तक पर छायी है चर्बी, भूल गये सब दाँव।
नहीं रही अपने आँगन मेंआज नीम की छाँव।।
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पशुशाला में बैलों के, अब खूँटे हैं सब खाली,
खाद न हो गोबर की तो, लगती कृत्रिम हरियाली?
'रूप' हंस का भर कर बगुले बैठे हैं हर ठाँव।
नहीं रही अपने आँगन मेंआज नीम की छाँव।।
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5 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार 9 नवंबर 2020 को 'उड़ीं किसी की धज्जियाँ बढ़ी किसी की शान' (चर्चा अंक- 3880) पर भी होगी।--
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

    जवाब देंहटाएं
  2. एकदम यथार्थ ...
    गांव की समसामयिक तस्वीर को अक्षरशः अभिव्यक्ति देता हृदयस्पर्शी गीत !!!

    जवाब देंहटाएं
  3. पशुशाला में बैलों के, अब खूँटे हैं सब खाली,
    खाद न हो गोबर की तो, लगती कृत्रिम हरियाली?
    'रूप' हंस का भर कर बगुले बैठे हैं हर ठाँव।
    नहीं रही अपने आँगन में, आज नीम की छाँव।।

    –सामयिक सार्थक चिंतन की उम्दा भावाभिव्यक्ति
    -वन्दन

    जवाब देंहटाएं

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