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गुरुवार, 5 नवंबर 2020

गीत "उसूल नापता रहा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

लक्ष्य तो मिला नहीं, उसूल नापता रहा।
काव्य की खदान में, धूल चाटता रहा।।
--
पथ में जो मिला मुझे, मैं उसी का हो गया।
स्वप्न के वितान में, मन गगन में खो गया।
शूल की धसान में, बबूल छाँटता रहा।
काव्य की खदान में, धूल चाटता रहा।।
--
चेतना के गाँव में, चेतना तो सो गयी।
अन्धकार छा गया, दिन में शाम हो गयी,
और मैं मकान में, गूल पाटता रहा।
काव्य की खदान में, धूल चाटता रहा।।
--
रत्न खोजने चला हूँ, पर्वतों के देश में।
कुछ अभी मिला नहीं, पत्थरों के वेश में।
किन्तु ख़ानदान में, उसूल बाँटता रहा।
काव्य की खदान में, धूल चाटता रहा।।
--
चन्द्रिका मयंक की, तन-बदन जला रही।
कुटिल ग्रहों की चाल भी, कुचक्र को चला रही।
और मैं मचान की, झूल काटता रहा।
काव्य की खदान में, धूल चाटता रहा।।
--

6 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (०७-११-२०२०) को 'मन की वीथियां' (चर्चा अंक- ३८७८) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. –प्रातः वन्दन!
    रत्न खोजने चला हूँ, पर्वतों के देश में।
    कुछ अभी मिला नहीं, पत्थरों के वेश में।
    किन्तु ख़ानदान में, उसूल बाँटता रहा।
    काव्य की खदान में, धूल चाटता रहा।

    –वाहः... रोमांचक भावाभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं
  3. चेतना के गाँव में, चेतना तो सो गयी।
    अन्धकार छा गया, दिन में शाम हो गयी,
    और मैं मकान में, गूल पाटता रहा।
    काव्य की खदान में, धूल चाटता रहा।।

    वाह...
    आदरणीय! बेहद सुंदर गीत
    साधुवाद 🙏🍁🙏
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं

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