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सोमवार, 16 नवंबर 2020

दोहे "बदलो जीवन-ढंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

विदा हुई दीपावली, आई शीतल भोर।
कुहरा भी छाने लगा, अब तो चारों ओर।।
--
कोरोना के काल में, मेले हुए उदास।
अभी समय विकराल है, घर में करो निवास।।

--

चहल-पहल दीवान का, सीमित है संसार।
नानकमत्ता में नहीं, मेला है इस बार।।

--

खुशियों के परिवेश हों, लौटे फिर उल्लास।
नानक के दरबार में, करो आप अरदास।।

--

निकट कार्तिक पूर्णिमा, बहता निर्मल नीर।
कृपा करो भगवान अब, लौटे सुखद समीर।।

--

कोरोना दिखला रहा, फिर से अपने रंग।
जीवन-यापन के अभी, बदलो जीवन-ढंग।।

--

चूक सुरक्षा में नहीं, करना मत रणधीर।
सीमाओं पर देश की, हालत है गम्भीर।

 --

7 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (17-11-20) को "बदलो जीवन-ढंग"'(चर्चा अंक- 3888) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  2. कोरोना दिखला रहा, फिर से अपने रंग।
    जीवन-यापन के अभी, बदलो जीवन-ढंग।।

    ...श्रेष्ठतम संदेशात्मक देाहे !!!

    जवाब देंहटाएं
  3. सुन्दर,अर्थपूर्ण व प्रभावशाली रचनाएं - - साधुवाद सह।

    जवाब देंहटाएं
  4. कोरोना दिखला रहा, फिर से अपने रंग।
    जीवन-यापन के अभी, बदलो जीवन-ढंग।।
    --
    चूक सुरक्षा में नहीं, करना मत रणधीर।
    सीमाओं पर देश की, हालत है गम्भीर।

    अत्यंत प्रेरक, संदेशमय दोहे

    साधुवाद आदरणीय 🙏
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं

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