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रविवार, 22 नवंबर 2020

बालकविता "बिल्ली मौसी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बिल्ली मौसी बिल्ली मौसी,
क्यों इतना गुस्सा खाती हो।
कान खड़ेकर बिना वजह ही
रूप भयानक दिखलाती हो।।

--

 छल और कपट तुम्हारे मन में,

धोखा जग को देती हो?
झाँसा देने को मौसी तुम,
आँख मूँद क्यों बैठी हो?

--

मुझे न छोटा जन्तु समझना,
आफत का परकाला हूँ।।
तुम खाला हो कितनी भोली,
मैं ज्ञानी-मतवाला हूँ।
--
मैं गणेश जी का वाहन हूँ,
मैं दुनिया में भाग्यवान हूँ।
चाल समझता तेरी बिल्ली,
गुणी, चतुर सौभाग्यवान हूँ।।

--


 

6 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार 23 नवंबर 2020 को 'इन दिनों ज़रूरी है दूसरों के काम आना' (चर्चा अंक-3894) पर भी होगी।--
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

    जवाब देंहटाएं
  2. शिशु साहित्यिक रचना के लिए आपको असंख्य नमन, दरअसल इस युग में बहुत कम लोग इस विधा में पारंगत होते हैं - - इन्हें लिखने के लिए कवि का मन बाल सुलभ होना ज़रूरी है - - बहुत श्रेष्ठ सृजन।

    जवाब देंहटाएं

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