गुरुवार, 26 नवंबर 2020

ग़ज़ल "कठिन बुढ़ापा बीमारी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

हिम्मत अभी नहीं हारी है
जंग ज़िन्दगी की जारी है
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मोह पाश में बँधा हुआ हूँ
ये ही तो दुनियादारी है
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ज्वाला शान्त हो गई तो क्या
दबी राख में चिंगारी है
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किस्मत के सब भोग भोगना
इस जीवन की लाचारी है
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चार दिनों के सुख-बसन्त में
मची हुई मारा-मारी है
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हाल भले बेहाल हुआ हो
जान सभी को ही प्यारी है
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उसकी लीला-वो ही जाने
ना जाने किसकी बारी है
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ढल जायेगा 'रूप' एक दिन
कठिन बुढ़ापा बीमारी है 
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11 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 27-11-2020) को "लहरों के साथ रहे कोई ।" (चर्चा अंक- 3898) पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित है।

    "मीना भारद्वाज"

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  2. शाश्र्वत सत्य

    बेहतरीन दोहे
    🙏

    जवाब देंहटाएं
  3. वृद्धावस्था बीमारी नही, हिम्मत न हारने की प्रेरणा है।

    जवाब देंहटाएं
  4. हिम्मत अभी नहीं हारी है
    जंग ज़िन्दगी की जारी है
    बहुत सुंदर।

    जवाब देंहटाएं

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