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शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2021

दोहे "माता जी का श्राद्ध" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

माता दशमी तिथि को, चली गयीं परलोक।

तब से अब तक हृदय में, भरा हुआ है शोक।।

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पैंसठ वर्षों तक रहा, सिर पर माँ का हाथ।

जब से माँ सुरपुर गयी, मैं हो गया अनाथ।।

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श्रद्धा से मैं श्राद्ध को, करता हूँ निष्पन्न।

होते माँ के नाम से, सभी कार्य सम्पन्न।।

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लेकर भोजन थाल को, जला सुगन्धित धूप।

कभी नहीं हूँ भूलता, माता जी का रूप।।

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सच्चे मन से कर रहा, माता का गुण-गान।

माता ही सन्तान का, रखती हर-पल ध्यान।।

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सारे सपनों को करें, माता जी साकार।

कर्मों से ही तो बने, जीवन का आधार।।

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घर भर में धन-धान्य का, कभी न रहा अकाल।

माता के आशीष ने, मुझको किया निहाल।।

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4 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(०२-१०-२०२१) को
    'रेत के रिश्ते' (चर्चा अंक-४२०५)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. माता जी के श्राद्ध पर समर्पित बहुत सुंदर रचना ,आदरणीय ।
    माता जी के आशीर्वाद से आपकी सभी मनोकामना पूर्ण हो ।

    जवाब देंहटाएं
  3. आदरणीय माता जी को सादर नमन । मां को समर्पित सुंदर और आत्मीय दोहे ।

    जवाब देंहटाएं
  4. सम्मान प्यार और आदर के साथ प्रेषित सुंदर दोहे माँ को समर्पित।🙏🏼

    जवाब देंहटाएं

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