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सोमवार, 18 अक्तूबर 2021

गीत "तुम पंखुरिया फैलाओ तो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जलने को परवाना आतुरआशा के दीप जलाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातकगगरी से जल छलकाओ तो।।
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मधुवन में महक समाई हैकलियों में यौवन सा छाया,
मस्ती में दीवाना होकरभँवरा उपवन में मँडराया,
मन झूम रहा होकर व्याकुलतुम पंखुरिया फैलाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातकगगरी से जल छलकाओ तो।।
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मधुमक्खी भीने-भीने स्वर मेंसुन्दर राग सुनाती है,
सुन्दर पंखों वाली तितली भीआस लगाए आती है,
सूरज की किरणें कहती हैकलियों खुलकर मुस्काओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातकगगरी से जल छलकाओ तो।।
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चाहे मत दो मधु का कणभरपर आमन्त्रण तो दे दो,
पहचानापन विस्मृत करकेइक मौन-निमन्त्रण तो दे दो,
काली घनघोर घटाओं मेंबिजली बन कर आ जाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातकगगरी से जल छलकाओ तो।।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (19-10-21) को "/"तुम पंखुरिया फैलाओ तो(चर्चा अंक 4222) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है..आप की उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी .
    --
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर भावों से पूर्ण रचना

    जवाब देंहटाएं
  3. सुंदर छंदों की रचना! अनुपम भावाभिव्यक्ति!--ब्रजेंद्रनाथ

    जवाब देंहटाएं

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