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गुरुवार, 21 अक्तूबर 2021

गीत "जादू-टोने, जोकर-बौने, याद बहुत आते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

घर-आँगन वो बाग सलोने, याद बहुत आते हैं
बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

जब हम गर्मी में की छुट्टी में, रोज नुमाइश जाते थे
इस मेले को दूर-दूर से, लोग देखने आते थे
सर्कस की वो हँसी-ठिठोली, भूल नहीं पाये अब तक
जादू-टोने, जोकर-बौने, याद बहुत आते हैं
बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

शादी हो या छठी-जसूठन, मिलकर सभी मनाते थे
आस-पास के लोग प्रेम से, दावत खाने आते थे
अब कितना बदलाव हो गया, अपने रस्म-रिवाजो में
दावत के वो पत्तल-दोने याद बहुत आते हैं
बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

कभी-कभी हम जंगल से भी, सूखी लकड़ी लाते थे
उछल-कूद कर वन के प्राणी, निज करतब दिखलाते थे
वानर-हिरन-मोर की बोली, गूँज रही अब तक मन में
जंगल के निश्छल मृग-छौने याद बहुत आते हैं
बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

लुका-छिपी और आँख-मिचौली, मन को बहुत लुभाते थे
कुश्ती और कबड्डी में, सब दाँव-पेंच दिखलाते थे
होले भून-भून कर खाते, खेत और खलिहानों में
घर-आँगन के कोने-कोने याद बहुत आते हैं
बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

7 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार(२२-१०-२०२१) को
    'शून्य का अर्थ'(चर्चा अंक-४२२५)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. बचपन की और उस समय की मीठी यादों की कसक लिए सुंदर हृदय स्पर्शी रचना।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं
  3. बचपन किसी न किसी रूप में सदा साथ रहता है

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर- रचना।
    बचपन की यादें ह्रदय के कोने में आज भी मुस्कुराती हैं।

    जवाब देंहटाएं

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