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गुरुवार, 7 अक्तूबर 2021

नवगीत "डोलियाँ सजने लगीं, बजने लगीं हैं तालियाँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


धान के बिरुओं ने,
पहनी हैं नवेली बालियाँ।
धान्य से भरपूर,
खेतों में झुकी हैं डालियाँ।।


क्वार का आया महीना,
हो गया निर्मल गगन,
ताप सूरज का घटा,
बहने लगी शीतल पवन,
देवपूजन के लिए,
सजने लगी हैं थालियाँ।

धान्य से भरपूर,
खेतों में झुकी हैं डालियाँ।।


सुमन-कलियों की चमन में,
डोलियाँ सजने लगीं,
भ्रमर गुंजन कर रहे,
शहनाइयाँ बजने लगीं,
प्रणय-मण्डप में मधुर,
बजने लगीं हैं तालियाँ।

धान्य से भरपूर,
खेतों में झुकी हैं डालियाँ।।

5 टिप्‍पणियां:

  1. आप को सपरिवार नवरात्र की शुभकामनाएं

    जवाब देंहटाएं
  2. सामयिक सुंदरता का अति खूबसूरत वर्णन ।

    जवाब देंहटाएं
  3. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार (08 -10-2021 ) को 'धान्य से भरपूर, खेतों में झुकी हैं डालियाँ' (चर्चा अंक 4211) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। रात्रि 12:01 AM के बाद प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

    जवाब देंहटाएं
  4. गीत तो बहुत सुंदर है!
    पर हकीकत थोड़ी अलग है
    बारिश के चलते तहस-नहस हो गई है बालियां!

    जवाब देंहटाएं

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