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रविवार, 3 अक्तूबर 2021

दोहे "है आराम हराम" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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जहाँ एक पथ बन्द हो, मिले दूसरी राह।
लेकिन होनी चाहिए, मन में थोड़ी चाह।।
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बिना साधना के नहीं, होता कोई काम।
लक्ष्य साधने के लिए, है आराम हराम।।
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आगे बढ़ने के लिए, होते बहुत विकल्प।
मन में धारण कीजिए, ध्येय और संकल्प।।
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अपनी वाणी पर नहीं, है जिसको अधिकार।
जीवन के हर क्षेत्र में, जाता है वो हार।।
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झूठ बोलने से नहीं, आता है जो बाज।
सफल नहीं होता कभी, उसका कोई काज।।
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मजबूती से थामता, जो जल में पतवार।
चंचल लहरें चीरकर, हो जाता वो पार।।
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मन में जिसके है नहीं, झूठ और अभिमान।
मिलता उसको ही यहाँ, गौरव और गुमान।।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (04-10-2021 ) को 'जहाँ एक पथ बन्द हो, मिले दूसरी राह' (चर्चा अंक-4207) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। रात्रि 12:01 AM के बाद प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

    जवाब देंहटाएं
  2. अच्‍छे, प्रेरक दोहे हैं। एक बार पढ कर मन नहीं भरता। अभी-अभी, फेस बुक पर साझा किए हैं।

    जवाब देंहटाएं

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