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शनिवार, 9 अक्तूबर 2021

दोहे "पढ़ गीता के श्लोक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मालिक कोई और है, जीव किरायेदार।

सब उसके ही हाथ में, कितना दे अधिकार।।

 

माता के नवरात्र की, महिमा बड़ी अपार।

मानव चोला है मिला, लो परलोक सुधार।।

 

नौ दिन तक दुर्गा जपी, फिर मुर्गा से प्यार।

धोखा खुद को दे रहे, कुछ तो करो विचार।।

 

साबुन से धोया बहुत, आया नहीं निखार।

गधा न गइया बन सका, गया मुसाफिर हार।।

 

तन से हों उजले भले, मन से नहीं पवित्र।

भगवा चोला क्या करे, बदला नहीं चरित्र।।

 

ओम नाम का जाप कर, पढ़ गीता के श्लोक।

इश्क-मुश्क से तो नहीं, सुधरेगा परलोक।।

 

फसल उगी अज्ञान की, समय गँवाया व्यर्थ!

जैसी हो शब्दावली, वैसा निकले अर्थ!!

 

3 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-10-21) को "पढ़ गीता के श्लोक"(चर्चा अंक 4213) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    ------------
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही जीवन्‍त दोहे। पढकर आनन्‍द आ गया। इन्‍हें फेस बुक पर साझा कर रहा हूँ।

    जवाब देंहटाएं

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