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रविवार, 6 अक्तूबर 2013

"अपनी भारत-माता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मैं हिमगिरि हूँ सच्चा प्रहरी,
रक्षा करने वाला हूँ।
शीश-मुकुट हिमवान अचल हूँ,
सीमा का रखवाला हूँ।।
मैं अभेद्य दुर्ग का,
 उन्नत बलशाली परकोटा हूँ।
मैं हूँ वज्र समान हिमालय,
कोई न छोटा-मोटा हूँ।।

माँ की आन-बान की खातिर,

सजग हमेशा खड़ा हुआ हूँ,
दुश्मन को ललकार रहा हूँ,
मुस्तैदी से अड़ा हुआ हूँ,
प्राणों से प्यारी माता के लिए,
वीर बलिदान हो गये।
संगीनों पर माथा रखके,
सरहद पर कुर्बान हो गये।।
मैं सागर हूँ देव-भूमि को,
दिन और रात सवाँर रहा हूँ।
मैं गंगा के पावन जल से,
माँ के चरण पखार रहा हूँ।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - सोमवार - 07/10/2013 को
    अब देश में न आना तुम गाधी
    - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः31
    पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


    जवाब देंहटाएं
  2. अच्छी POST है हमारे BLOG मे भी आये www.hinditechtrick.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  4. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [07.10.2013]
    चर्चामंच 1391 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें |
    नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाओं सहित
    सादर
    सरिता भाटिया

    जवाब देंहटाएं
  5. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार गुरुवर-

    जवाब देंहटाएं
  6. राष्ट्र को व्यक्तित्व के रूप में सँवार दिया आपके शब्दों ने। बहुत सुन्दर

    जवाब देंहटाएं
  7. बढ़िया प्रस्तुति -

    मैं हिमगिरि हूँ सच्चा प्रहरी,
    रक्षा करने वाला हूँ।
    शीश-मुकुट हिमवान अचल हूँ,
    सीमा का रखवाला हूँ।।
    शिव जी का कैलास कहावूं ,

    मौसम का रखवारा हूँ ,मानसून का प्यारा हूँ।

    जवाब देंहटाएं

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