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गुरुवार, 10 सितंबर 2020

गीत "स्वाभाविक शृंगार, बहुत अच्छा लगता है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



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शिष्ट मधुर व्यवहार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।
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फूहड़पन के वस्त्र, बुरे सबको लगते हैं,
जंग लगे से शस्त्र, बुरे सबको लगते हैं,
स्वाभाविक शृंगार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।
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वचनों से कंगाल, बुरे सबको लगते हैं,
जीवन के जंजाल, बुरे सबको लगते हैं,
सजा हुआ घर-बार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।
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चुगलखोर इन्सान, बुरे सबको लगते हैं,
सूदखोर शैतान, बुरे सबको लगते हैं,
सज्जन का सत्कार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।
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लुटे-पिटे दरबार, बुरे सबको लगते हैं,
दुःखों के अम्बार, बुरे सबको लगते हैं,
हरा-भरा परिवार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।
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मतलब वाले यार, बुरे सबको लगते हैं,
चुभने वाले खार, बुरे सबको लगते हैं,
निश्छल सच्चा प्यार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 11-09-2020) को "मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ " (चर्चा अंक-3821) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है.

    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
  2. सपनों का संसार सभी का अपना होता है ... शायद इसलिए अच्छा लगता है ...
    सुन्दर गीत ....

    जवाब देंहटाएं

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