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रविवार, 6 सितंबर 2020

गीत "कुदरत का हर काज सुहाना लगता है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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सबको अपना आज सुहाना लगता है।
छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
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उडने को  आकाश पड़ा है,
पुष्पक भी तो पास खड़ा है,
पंछी को परवाज सुहाना लगता है।
छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
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राजनीति की सनक चढी है,
लोलुपता की  ललक बढ़ी है,
काँटों का भी ताज सुहाना लगता है।
छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
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धानों पर आ गई बालियाँ,
हरे रंग में रँगी डालियाँ,
कुदरत का हर काज सुहाना लगता है।
छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
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गुञ्जन करना और इठलाना,
भीना-भीना राग सुनाना,
मलयानिल का साज सुहाना लगता है।
छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
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तन-मन ने ली है अँगड़ाई,
कञ्चन सी काया गदराई,
पर्वों का आगाज सुहाना लगता है।
छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
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टेसू दहका अंगारा सा,
आशिक बहका आवारा सा,
बासन्ती अन्दाज सुहाना लगता है।
छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
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8 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार ( 7 सितंबर 2020) को 'ख़ुद आज़ाद होकर कर रहा सारे जहां में चहल-क़दमी' (चर्चा अंक 3817) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    -रवीन्द्र सिंह यादव

    जवाब देंहटाएं
  2. सबको अपना आज सुहाना लगता है।
    छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
    बहुत ही सुंदर बिल्कुल सही फरमाया आदरणीय शास्त्री जी

    जवाब देंहटाएं
  3. सबको अपना आज सुहाना लगता है।
    छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
    वाह!!!
    बहुत सुन्दर मनभावन सृजन।

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह ! मानव चरित्र को प्रकृति के साथ जोड़कर एक बेहतरीन संदेश।

    जवाब देंहटाएं
  5. व्यंग्य! और साथ ही सुंदर प्रकृति चित्रण सुंदर गीत ।

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर और सटीक प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं
  7. 'छिपा हुआ हर राज सुहाना लगता है।'-यह पंक्ति रचना को अलंकृत करते आभूषण सरीखी है।... बहुत ही सुन्दर रचना!

    जवाब देंहटाएं

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