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गुरुवार, 3 सितंबर 2020

"जितने ज्यादा आघात मिले, उतना ही साहस पाया है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जितने ज्यादा आघात मिले,
उतना ही साहस पाया है।
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।
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था कभी फूल सा कोमल जो,
सन्तापों से मुरझाता था,
पर पीड़ा को मान निजी,
आकुल-व्याकुल हो जाता था,
इस दुनिया का व्यवहार देख,
पथरीला पथ अपनाया है।
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।
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चिकनी-चुपड़ी सी बातों का,
अब असर नहीं कोई होता,
जिससे जल-प्लावन होता था,
वो कब का सूख गया सोता,
जो साज नहीं अब तक आया,
मैंने वो साज बजाया है,
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।
--
झूठी मायाहै झूठा जग,
छिपकर बैठे हैं भोले ठग,
बाहर हैं दाँत दिखाने के,
खाने के मुँह में छिपे अलग,
कमजोर समझकर शाखा को,
दीमक ने पाँव जमाया है।
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 04-09-2020) को "पहले खुद सागर बन जाओ!" (चर्चा अंक-3814) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है.

    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
  2. आदरणीय रूपचंद्र शास्त्री "मयंक " सर, जीवन जीने का पथ दिखलाती, व्यवहार सिखाती, सुंदर रचना! हार्दिक साधुवाद!--ब्रजेन्द्रनाथ

    जवाब देंहटाएं
  3. था कभी फूल सा कोमल जो,
    सन्तापों से मुरझाता था,
    पर पीड़ा को मान निजी,
    आकुल-व्याकुल हो जाता था,
    इस दुनिया का व्यवहार देख,
    पथरीला पथ अपनाया है।
    मृदु मोम बावरे मन को अब,
    मैंने पाषाण बनाया है।।
    इस कविता की एक एक पंक्ति मन को छू गई। यूँ लगा जैसे आपने मेरे मन की बात लिख दी और ना जाने कितनों को यही लगेगा इस कविता को पढ़कर। कोरी भावुकता और मोम सा हृदय व्यावहारिक जीवन में काम नहीं आते। कभी कभी जैसे को तैसा बनना पड़ता है। साधुवाद एवं सादर प्रणाम !!!

    जवाब देंहटाएं

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