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सोमवार, 7 सितंबर 2020

दोहे "करो भोज स्वीकार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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दादा जी का था कभी, देखा जैसा रूप।
वैसा ही अनुमान से, बना दिया प्रतिरूप।।
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दादा-दादी का नहीं, घर में कोई चित्र।
मन में मेरे है बसा, उनका मात्र चरित्र।।
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फोटोग्राफी उस समय, रही चलन से दूर।
चित्राकंन से इसलिए, रहा आम मजबूर।।
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दादी को देखा नहीं, कैसा था आकार।
मन ही मन करता उन्हें, नमन हजारों बार।।
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दादा-दादी का हुआ, असमय में अवसान।
तिथि षष्टी को नमन कर, करता भोज प्रदान।।
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अपने वंशज का करो, देव भोज स्वीकार।
कृपा आपकी चाहता, मेरा कुल परिवार।।
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पाँच साल की आयु तक, जैसा दिया दुलार।
पितृदेव अब भी करो, मुझको वैसा प्यार।।
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5 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (8-9 -2020 ) को "ॐ भूर्भुवः स्वः" (चर्चा अंक 3818) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
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    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  2. पितृ पक्ष पर भावनाओं का सुंदर चित्रण !

    जवाब देंहटाएं
  3. पाँच साल की आयु तक, जैसा दिया दुलार।
    पितृदेव अब भी करो, मुझको वैसा प्यार।।
    ...पितरों की अनुकम्पा बनी रहे सदा यही कामना सभी करते हैं
    बहुत अच्छी सामयिक प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं

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