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गुरुवार, 5 मई 2011

"भारत माँ का कर्ज चुकाना है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मित्रों!
कई वर्ष पहले यह गीत रचा था!
पिछले साल इसे श्रीमती अर्चना चावजी को भेजा था।
उसके बाद मैं इसे ब्लॉग पर लगाना भूल गया।
आज अचानक ही एक सी.डी. हाथ लग गई,
जिसमें  मेरा यह गीत भी था!
इसको बहुत मन से समवेत स्वरों में 
मेरी मुँहबोली भतीजियों 
श्रीमती अर्चना चावजी  और उनकी छोटी बहिन रचना बजाज ने गाया है।
आप भी इस गीत का आनन्द लीजिए!



तन, मन, धन से हमको, भारत माँ का कर्ज चुकाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

राम-कृष्ण, गौतम, गांधी की हम ही तो सन्तान है,
शान्तिदूत और कान्तिकारियों की हम ही पहचान हैं।
ऋषि-मुनियों की गाथा को, दुनिया भर में गुंजाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

उनसे कैसा नाता-रिश्ता? जो यहाँ आग लगाते हैं,
हरे-भरे उपवन में, विष के पादप जो पनपाते हैं,
अपनी पावन भारत-भू से, भय-आतंक मिटाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

जिनके मन में रची बसी, गोरों की काली है भाषा,
ये गद्दार नही समझेंगे, जन,गण, मन की अभिलाषा ,
हिन्दी भाषा को हमको, जग की शिरमौर बनाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

प्राण-प्रवाहक, संवाहक हम, यही हमारा परिचय है,
हम ही साधक और साधना, हम ही तो जन्मेजय हैं,
भारत की प्राचीन सभ्यता, का अंकुर उपजाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

वीरों की इस वसुन्धरा में, आयी क्यों बेहोशी है?
आशाओं के बागीचे में, छायी क्यों खामोशी है?
मरघट जैसे सन्नाटे को, दिल से दूर भगाना है।
फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

19 टिप्‍पणियां:

  1. जिनके मन में रची बसी, गोरों की काली है भाषा,
    ये गद्दार नही समझेंगे, जन,गण, मन की अभिलाषा ,
    हिन्दी भाषा को हमको, जग की शिरमौर बनाना है।
    फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

    बहुत ही सुन्दर और भावप्रवण गीत्………शानदार आह्वान्।

    जवाब देंहटाएं
  2. तन, मन, धन से हमको, भारत माँ का कर्ज चुकाना है..
    अपनी पावन भारत-भू से, भय-आतंक मिटाना है..

    बहुत ही सुन्दर देशप्रेम से ओतप्रोत रचना...

    जवाब देंहटाएं
  3. भावप्रवण गीत और मधुर आवाज का संगम

    जवाब देंहटाएं
  4. वीरों की इस वसुन्धरा में, आयी क्यों बेहोशी है?
    आशाओं के बागीचे में, छायी क्यों खामोशी है?
    मरघट जैसे सन्नाटे को, दिल से दूर भगाना है।
    फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

    बहुत सुंदर गीत !बहुत सुंदर रचना !

    जवाब देंहटाएं
  5. geet bahut sunder hai aur usse bhi adhik manmohak aavaz aur gayan ne samaa baandh diya...bahut khoob.

    जवाब देंहटाएं
  6. sir ji namskar
    bahut hi sunder geet hein
    suna to nahi

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत ही सुन्दर और प्रेरक रचना..

    जवाब देंहटाएं
  8. बेहतरीन प्रस्तुति..... सुंदर भाव सुंदर आवाज़...

    जवाब देंहटाएं
  9. प्राण-प्रवाहक, संवाहक हम, यही हमारा परिचय है,हम ही साधक और साधना, हम ही तो जन्मेजय हैं,भारत की प्राचीन सभ्यता, का अंकुर उपजाना है।फिर से अपने भारत को, जग का आचार्य बनाना है।।

    आनंद आ गया शास्त्री जी आपकी उर्जामय,हृदय को जाग्रत करती प्रस्तुति पढकर.

    आज ही नई पोस्ट जारी की है.कृपया मेरे ब्लॉग पर आ अपने सुविचारों से वहां भी आनंद का संचार करें

    जवाब देंहटाएं
  10. गेयता के आधार पर किया गया किचिंत बदलाव भी दोनों की सुमधुर आवाज में अच्छा लगा...बधाई.

    जवाब देंहटाएं
  11. गेट के साथ आवाज़ भी जोश भर देती है ..बहुत सुन्दर

    जवाब देंहटाएं
  12. आपने सच्चे मन से गाया है, बहुत-बहुत बधाई।

    मार्कण्ड दवे।
    http://mktvfilms.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं

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