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मंगलवार, 9 अगस्त 2011

"दोहे-...टिम-टिम हों खद्योत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



सुबह हुई अब तो उठो, खोलो मन का द्वार।
करके पूजा-जाप को, लो बुहार घर-बार।१।


सुथरे तन में ही रहे, निर्मल मन का वास।
मोह और छलछद्म भी, नहीं फटकता पास।२।


श्रम से अर्जित आय से, पूरी होती आस।
सागर के जल से कभी, नहीं मिटेगी प्यास।३।


चलना ही है जिन्दगी, रुकना तो है मौत।
सूरज जग रौशन करे, टिम-टिम हों खद्योत।४।

21 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर दोहे! लाजवाब !

    जवाब देंहटाएं
  2. चलना ही है जिन्दगी, रुकना तो है मौत।
    सूरज जग रौशन करे, टिमटिमाए खद्योत।४।

    शास्त्री जी लाजवाब। इस विधा में भी आपकी महारत हासिल है। नमन है आपको।

    जवाब देंहटाएं
  3. श्रम से अर्जित आय से, पूरी होती आस।

    सागर के जल से कभी, नहीं मिटेगी प्यास।३।

    वाह... सत्य वचन

    जवाब देंहटाएं
  4. हमेशा की ही तरह बढ़िया....

    जवाब देंहटाएं
  5. सर , बहुत सुन्दर भाव - "मोह और छलछद्म भी, नहीं फटकता पास"

    क्या बात है...

    जवाब देंहटाएं
  6. अब तक दोहे आपके,मैंने पढ़े अनेक.
    पर ये चारो वाक़ई,एक से बढ़कर एक.

    जवाब देंहटाएं
  7. वाह मन खुश हो गया इतना अद्भुत प्रस्तुति से शब्दों का तालमेल बहुत ही अच्छा है वाह एक बार फिर से :)


    कई जिस्म और एक आह!!!

    जवाब देंहटाएं
  8. शास्त्री जी आपकी सहज शैली पे रश्क होता है...जिस भी विषय पे चाहें आप लिख लेते हैं...

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत सुंदर, शुभकामनाएं.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  10. चलना ही है जिन्दगी, रुकना तो है मौत।
    सूरज जग रौशन करे, टिम-टिम हों खद्योत


    behatarin post dil jeet liya


    http://eksacchai.blogspot.com/2011/08/blog-post.html

    जवाब देंहटाएं

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