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मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

गीत "सूखे हुए छुहारे, जग को लुभा गये हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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अंगूर के सभी गुण,
किशमिश में आ गये हैं।
सूखे हुए छुहारे,
जग को लुभा गये हैं।।
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बूढ़े हुए तो क्या है,
मन में भरा है यौवन,
गीतों के जाम में ही,
ढाला हुआ है जीवन,
इस उम्र में भी हम तो,
दुनिया को भा गये हैं।
सूखे हुए छुहारे,
जग को लुभा गये हैं।।
--
हम तो नवल-नवेले,
थाली के हम हैं बेले,
काँसे की खन-खनक में,
नाचे हैं और खेले,
महफिल में शायरों की,
हम अब भी छा गये हैं।
सूखे हुए छुहारे,
जग को लुभा गये हैं।।
--
ठेले हैं शब्द हमने,
कुछ जोड़-तोड़ करके,
कविता परोसते हैं,
हम तोड़-मोड़ करके,
कुछ काव्य साधना से,
अनुराग पा गये हैं।
सूखे हुए छुहारे,
जग को लुभा गये हैं।।

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7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी काव्य-रचना है यह शास्त्री जी। जो इसका मर्म समझ ले, उसके लिए तो यह सतत प्रेरणा की सरिता बनकर रहेगी।

    जवाब देंहटाएं
  2. ठेले हैं शब्द हमने,
    कुछ जोड़-तोड़ करके,
    कविता परोसते हैं,
    हम तोड़-मोड़ करके,
    कुछ काव्य साधना से,
    अनुराग पा गये हैं।
    सूखे हुए छुहारे,
    जग को लुभा गये हैं।।

    दमदार कटाक्ष उन कथित कवियों पर जो साहित्य जगत में सम्मानित स्थान पाने की लालसा तो रखते हैं लेकिन स्वयं सृजन के प्रयास से नहीं....

    साधुवाद आदरणीय 🙏

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत खूबसूरती से एक -एक शब्द लिखा है कम शब्दों में कहें तो शानदार लेखन सर

    जवाब देंहटाएं
  4. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज गुरुवार (०८-०४-२०२१) को (चर्चा अंक-४०३०) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर आदरणीय।
    व्यंग्य की तीक्ष्णता लिए सुंदर गीत।

    जवाब देंहटाएं

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