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बुधवार, 10 नवंबर 2021

दोहे "छठ माँ हरो विकार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उगते ढलते सूर्य काछठपूजा त्यौहार।
कोरोना के काल में, छठ माँ हरो विकार।।
 
अपने-अपने नीड़ से, निकल पड़े नर-नार।
सरिताओं के तीर परउमड़ा है संसार।।
 
अस्तांचल की ओर जबरवि करता प्रस्थान।
छठ पूजा पर अर्घ्य तबदेता हिन्दुस्थान।।
 
परम्पराओं पर टिकाअपना भारतवर्ष।
माता जी जय बोलकर, लोग मनाते हर्ष।।
 
षष्टी मइया कीजिएसबका बेड़ा पार।
मात की अरदास कोउमड़ा है संसार।।
 
छठपूजा के दिवस परकर लेना उपवास।
अन्तर्मन से कीजिएमाता की अरदास।।
 
उदित-अस्त रवि को सदाअर्घ्य चढ़ाना नित्य।
देता है जड़-जगत कोनवजीवन आदित्य।।
 
कठिन तपस्या के लिएछठ का है त्यौहार।
व्रत पूरा करके करोग्रहण शुद्ध आहार।।
 
पूर्वांचल से हो गयाछठ माँ का उद्घोष।
दुनियाभर में किसी कारहे न खाली कोष।।

7 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(११-११-२०२१) को
    'अंतर्ध्वनि'(चर्चा अंक-४२४५)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. सुंदर सृजन हार्दिक शुभकामनाएं।

    जवाब देंहटाएं
  3. लाजवाब दोहे छठ पर्व पर....
    वाह!!!

    जवाब देंहटाएं
  4. छठ मैया की जय !
    धार्मिक परम्परा से जुड़ी बहुत सुन्दर प्रार्थना !

    जवाब देंहटाएं

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