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मंगलवार, 2 नवंबर 2021

दोहे "आई चौदस रूप की, चहक रहे घर द्वार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
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आई चौदस रूप कीचहक रहे घर द्वार।
कुटिया-महलों में सजे, झालर-बन्दनवार।१।
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सारी दुनिया से अलगभारत के अंदाज।
दीपक यम के नाम काजला दीजिए आज।२।
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साफ-सफाई को करोसुधरेगा परिवेश।
देती नरकचतुर्दशीसबको यह सन्देश।३।
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जन्मे थे धनवन्तरीकरने को कल्याण।
रहें निरोगी सब मनुजजब तक तन में प्राण।४।
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भेषज लाये धरा से, धह्वन्तरि भगवान।
वैद्यराज संसार कोदेते जीवनदान।५।
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रोग किसी के भी नहींआये कभी समीप।
सबके जीवन में जलेंहँसी-खुशी के दीप।६।
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त्यौहारों की शृंखलापावन है संयोग।
इसीलिए दीपावलीमना रहे सब लोग।७।
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कुटिया-महलों में जलेंजगमग-जगमग दीप।
सरिताओं के रेत मेंमोती उगले सीप।८।
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पंचपर्व की शृंखला, लाती हर्ष-उमंग।
प्यार और उपहार के, भारत में हैं रंग।९।
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मौसम शीतल सा हुआ, घर में आये धान।
ऋतुओं के अनुकूल ही, पहनों अब परिधान।१०।
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2 टिप्‍पणियां:

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