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रविवार, 25 अक्तूबर 2020

दोहे "हुआ दशानन पुष्ट" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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लीलाएँ बाधित हुई, जला नहीं लंकेश।
चारों ओर बुराई का, जीवित है परिवेश।।
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मुख पर हैं मुखपट्टियाँ, भीतर से है दुष्ट।
कोरोना के काल में, हुआ दशानन पुष्ट।।
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होने लगे असत्य से, समझौते अनुबन्ध।
ओढ़ लबादा राम का, घूम रहे हैं दशकन्ध।।
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बिन माँगे ही मिल रहे, नवयुग के उपहार।
असभ्यता की बह रही, चारों ओर बयार।।
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रावण के पुतले रहे, लोगों को ललकार।
मन के शठ संहार के, बने नहीं हथियार।।
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चीन-पाक का जब तलक, मिटता नहीं गुरूर।
विजय-पर्व के तब तलक, लक्ष्य बहुत हैं दूर।।
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करते हैं फरियाद अब, धरा और आकाश।
भारत माता कह रही, करो शत्रु का नाश।।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (२६-१०-२०२०) को 'मंसूर कबीर सरीखे सब सूली पे चढ़ाए जाते हैं' (चर्चा अंक- ३८६६) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. रावण के पुतले रहे, लोगों को ललकार।
    मन के शठ संहार के, बने नहीं हथियार।।
    --
    उत्कृष्ट लेखन नमन

    जवाब देंहटाएं
  3. होने लगे असत्य से, समझौते अनुबन्ध।
    ओढ़ लबादा राम का, घूम रहे हैं दशकन्ध।।
    वाह!!!
    लाजवाब।

    जवाब देंहटाएं

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