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गुरुवार, 29 अक्तूबर 2020

दोहे "मत कर देना भूल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

कवियों की रचनाओं में, होते भाव प्रधान।
सात सुरों का जानते, गायक ही विज्ञान।।
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उच्चारण में शब्द की, मत कर देना भूल।
गाना कविता-गीत को, शब्दों के अनुकूल।।
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कल्पनाओं में हैं निहित, जाने कितने अर्थ।
कविताओं की भावना, करते शब्द समर्थ।।
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नियमित-नित्य रियाज से, बनता व्यक्ति महान।
साधक बनकर कीजिए, शब्दों की पहचान।।
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कदमताल हैं कर रहे, घात और प्रतिघात।
जीवन के हर मोड़ पर, पसरे झंझावात।।
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मौसम पल-पल बदलता, अपना नूतन रूप।
जीवन में मिलती नहीं, सदा सुहानी धूप।।
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थोड़े में होता नहीं, दुनिया को सन्तोष।
लगे लोग अब ढूँढते, सच्चाई में दोष।।

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7 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 30-10-2020) को "कितना और मुझे चलना है ?" (चर्चा अंक- 3870 ) पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित है.

    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
  2. न तो उच्चारण शुद्ध रह गया है न लेखन -भाषा और शब्दों के सावधान प्रयोग आज की महती आवश्यकता है.

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रेणना देती हुई रचना है मान्यवर👌👌

    जवाब देंहटाएं
  4. आज के अधिकतर रचनाकारों में धैर्य और बड़ों से सीखने की ललक नहीं है। रचनाकारों में ही नहीं, नई पीढ़ी के सभी लोगों में यही अतिआत्मविश्वास, विनम्रता की कमी और 'मुझे सब आता है' का भाव दिखाई देता है।
    उपयोगी एवं सटीक सीख देते दोहे। सादर प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं

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