मीराबाई,सूर, तुलसीदास चाहिए।
गधो को मिठाई नही घास चाहिए।।
गधों को मिठाई नही घास चाहिए।।
गधों को मिठाई नही घास चाहिए।।
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मँहगाई की मार लोग झेल रहे हैं,
जवाब देंहटाएंनेता घर में बैठे दण्ड पेल रहे हैं,
सिंहासन पर बैठी नही लाश चाहिए।
....बहुत सार्थक और सटीक रचना...आभार
वाह बहुत सही.
जवाब देंहटाएंगज़ब गज़ब गज़ब कर दिया शास्त्री जी………शानदार अभिव्यक्ति।
जवाब देंहटाएंसार्थक और सटीक रचना.
जवाब देंहटाएंजोरदार |
जवाब देंहटाएंबधाई |
जय हो गधे सभा की .....व्यंग्य करती रचना
जवाब देंहटाएंजाको जैसा रुचिकर लागे।
जवाब देंहटाएंबढ़िया प्रस्तुति,सटीक व्यंग करती सुंदर रचना,.....
जवाब देंहटाएंMY RECENT POST.....काव्यान्जलि.....:ऐसे रात गुजारी हमने.....
सटीक व्यंग
जवाब देंहटाएंबढिया है
जवाब देंहटाएंकरारा व्यंग
बहुत ही बढ़िया सार्थक और सटीक रचना....
जवाब देंहटाएंइंटरैस्टिंग!
जवाब देंहटाएं☺
जवाब देंहटाएंहम को घास चाहिये
जवाब देंहटाएंआपने सही पहचाना
पर बताया आपको
किसने ये भी तो
जरा जरा बताना ।
सार्थक और सटीक रचना...आभार
जवाब देंहटाएंआपकी पोस्ट 3/5/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
जवाब देंहटाएंकृपया पधारें
चर्चा - 868:चर्चाकार-दिलबाग विर्क
सटीक ... जोरदार
जवाब देंहटाएंगधों को मिठाई नही घास चाहिए।।.....wah kya likhe hain.
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