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मंगलवार, 28 जुलाई 2020

दोहे "कोरोना की बाढ़" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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अपना आज सँवार लोकर लो कर्म पुनीत। 
मौसम के उपहार हैंगरमी-पावस-शीत।।
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उनके मँहगे बिल सभीहो जाते है पास। 
जो सरकारी खर्च परनाप रहे आकाश।।
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जनसेवक तो देश केहोंगे नहीं विपन्न। 
भत्ते-वेतन छोड़ देंफिर भी हैं सम्पन्न।।
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अब तो सेवाभाव काखिसक रहा आधार।
कोरोना की बाढ़ मेंघिरा हुआ संसार।।
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चाहे पर उपकार हो, या हो खुद का पेट।
जनसेवक हर हाल में, दौलत रहा समेट।।
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जहाँ शेर के साथ में, बकरी का गठजोड़।
वहाँ अकेला चना तो, भाड़ न सकता फोड़।
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अपना माथा पीटतादोहाकार मयंक। 
गंगा जी में आ गयीतालाबों की पंक।।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. चाहे पर उपकार हो, या हो खुद का पेट।
    जनसेवक हर हाल में, दौलत रहा समेट।।
    वाह! बहुत सुंदर और सटीक

    जवाब देंहटाएं
  2. आज के हालातों को बयान करते दोहे.... आभार...

    जवाब देंहटाएं
  3. आज के हालात को बयान करते दोहे |

    जवाब देंहटाएं

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