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गुरुवार, 2 जुलाई 2020

भूमिका "शिक्षा और संस्कार से ओत-प्रोत, बालकृति ‘खिलता उपवन" (अनीता सैनी)

भूमिका
शिक्षा और संस्कार से ओत-प्रोत
बालकृति खिलता उपवन
         वरिष्ठ लेखक, कवि, दोहा विशेषज्ञ, बाल साहित्यकार डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक के बाल-कविता संग्रह खिलता उपवन की भूमिका लिखने के लिए मुझे पाण्डुलिपि प्राप्त हुई और उसे पढ़ने का सौभाग्य मुझे मिला तो मन गदगद हो उठा। साथ ही एक पूर्वाग्रह मन में समा गया कि एक लब्ध प्रतिष्ठित वरिष्ठ साहित्यकार की कृति के साथ मैं अपनी प्रथम भूमिका लेखन में न्याय कर सकूँगी या नहीं। लेकिन खिलता उपवनकी बाल कविताएँ बाँचकर मेरा मन धीरे-धीरे दृढ़ होता गया ।
         बचपन में हमें जो सीख-संस्कार और शिक्षा मिलती है वही हमारे जीवन की दिशा तय करती है । नींव में दबी ईंटे और भवन-सामग्री हमें दिखाई तो नहीं देती किन्तु बुलन्द इमारत का आधार नींव की ईंटें ही होती है । अतः बचपन की शिक्षा में बाल-सुलभ वृत्तियों के समावेश के साथ बाल-मनोविज्ञान का वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी समाहित होना चाहिए । बच्चे अपने आसपास के परिवेश से ही संस्कार ग्रहण करते हैं। कहा गया है कि चरित्र-निर्माण ही राष्ट्र-निर्माण है । बचपन में बच्चे अपने दादा-दादी, नाना-नानी अर्थात बुजुर्गों के निकट किस्से-कहानी, कविता और ज्ञान की बातें सीखने के लिए आतुर होते हैं । भले ही इंटरनेट-टेलिविजन पर बच्चों के लिए भाँति-भाँति की मनोरंजक सामग्री उपलब्ध है लेकिन आज भी बच्चे बालरचनाओं को अत्यधिक पसन्द करते हैं ।
          बहुधा देखा गया है कि कविता, कहानी, व्यंग्य आदि में भी बच्चों को रुचि होती है परन्तु बाल कविताओं का रुचिकर प्रयोग बाल मन पर गहरा असर डालता है। महत्त्वाकांक्षा के साथ नेतृत्त्व क्षमता का विकास, न्यायप्रियता, बन्धुत्त्व, सहभागिता, सहयोग, त्याग, परमार्थ जैसे जीवन मूल्यों की स्थापना के साथ बच्चों को परिवेश के प्रति सचेत करना साहित्यकारों दायित्व होता है।  कविता में भाव जगाने की अद्भुत शक्ति है ऐसे में बाल मन को भाने वाली सरस, सरल, संदेशपरक कविताओं का महत्त्व स्वतः ही बढ़ जाता है । बच्चों को बातों-बातों में ज्ञान की बात बता देना एक अद्भुत कला है जिसे खिलता उपवन की कविताएँ बाखूबी पूरा करतीं नजर आतीं हैं ।
           आजकल शाब्दिक चमत्कार, अलंकार के फेर में बाल कविताएँ क्लिष्ट और गरिष्ठ हो जातीं हैं जो बच्चों को अरुचिकर लगती हैं । डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंकने न केवल बालसाहित्य में अपितु प्रौढ़ साहित्य में भी सदैव सरल शब्दावली का प्रयोग किया है । उदाहरण स्वरूप खिलता उपवनकी यह कविता देखिए। जो बच्चों को एक बहुउपयोगी औषधीय पौधे से परिचित कराते हुए कहती है-
‘‘चाहे आक-अकौआ कह दो,
चाहे नाम मदार धरो,
भाँति-भाँति के रोगों में,
इस बिरुए से उपचार करो,
माटी कैसी भी हो चाहे,
यह खुद ही उग आता है’’
        सामाजिक परिवेश में घटित होते विभिन्न सांस्कृतिक घटनाक्रम और ऋतु परिवर्तन में फसल सम्बन्धी बातों को मयंक जी ने कितनी सरलता के साथ लिखा है? देखिए इस संग्रह की एक रचना-
‘‘दिवस बढ़े है शीत घटा है,
नभ से कुहरा-धुन्ध छटा है,
पक्षी कलरव राग सुनाते,
गेंहूँ के बिरुए लहराते’’
--
‘‘काँधों पर काँवडें सजाना,
बम भोले की धूम मचाना,
शिवशंकर को सभी रिझाते,
गेंहूँ के बिरुए लहराते’’
           आम जीवन में होने वाली हलचल, व सामाजिक जीवन की झलक को सरलता से समझाती कविता का सन्देश बहुत व्यापक है । उदाहरण के लिए देखिए कवि की यह रचना-
‘‘कोट पहनकर ओढ़ रजाई,
दादा जी ने आग जलाई,
मिल जाती गर्मी अलाव से,
लकड़ी-ईंधन पाना दूभर ।
सर्दी से जग ठिठुर रहा है,
बदन काँपता थर-थर-थर ।।’’
          शीत ऋतु में होने वाले बदलावों को कवि ने अपनी पैनी दृष्टि से देखा और बाल-सुलभ मनोभावों को समझते हुए मोहक शब्दावली में भावों को निम्न रूप में बाँधा है-
‘‘हीटर-गीजर और अँगीठी,
गजक, रेवड़ी-मूँगफली ।
गर्म समोसे,टिक्की-डोसा,
अच्छी लगती है इडली ।
मौसम के अनुकूल बया ने,
अपना नीड़ बनाया है ।
हाय भयानक इस सर्दी ने,
सबका हाड़ कँपाया है ।।’’
        वर्षा ऋतु की उथल-पुथल से बच्चों को परिचित कराती, ‘खिलता उपवनबालसंग्रह एक सुन्दर कविता का काव्यांश भी दृष्टव्य है-
‘‘काले-काले आये बादल ।
आसमान में छाये बादल ।।
--
छाया है घनघोर अँधेरा,
सूरज को बादल ने घेरा,
पानी भरकर लाये बादल ।
आसमान में छाये बादल ।।’’
         आदरणीय डॉ. मयंक जी द्वारा रचित खिलता उपवन बाल कविता संग्रह को संगोपांग पढ़कर मैंने अनुभव किया है कि बाल साहित्य को वही रच सकता है जो बच्चों के मनोविज्ञान से भली-भाँति परिचित हो । क्योंकि बच्चों के लिए साहित्य रचने के लिए साहित्यकार को खुद भी बच्चा बनना पड़ता है और बच्चों को उस स्थिति में क्या रुचिकर होगा, वही लिखना होता है ।
         मुझे पूरा विश्वास है कि यह बालकृति बाल साहित्य के मानडण्डों पर खरी उतरेगी और निस्सन्देह साहित्य जगत में भूरि-भूरि सराहना मिलेगी और खिलता उपवन बाल-साहित्य की उपयोगी एवं चर्चित पुस्तक बनेगी । साथ ही समीक्षकों के दृष्टिकोण से उपादेय सिद्ध होगी ।
अन्त में कविवर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी को हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करती हूँ और पुस्तक की सफलता की कामना करती हूँ ।
17 मार्च 2020
अनीता सैनी दीप्ति
साहित्यकार और ब्लॉग लेखिका
जयपुर, (राजस्थान)

6 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार
    (03-07-2020) को
    "चाहे आक-अकौआ कह दो,चाहे नाम मदार धरो" (चर्चा अंक-3751)
    पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है ।

    "मीना भारद्वाज"

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  2. कृति के अनुरूप ही भूमिका -उसके महत्व को रेखांकित करती ,विशेषताओं पर प्रकाश डालती उद्देश्य को उजागर करती हुई - साधुवाद प्रसतुत है !

    जवाब देंहटाएं
  3. सुंदर समीक्षा, बहुत बहुत बधाई !

    जवाब देंहटाएं
  4. समीक्षा से समझने का अवसर मिला. बधाई सुंदर लेखन के लिए.

    जवाब देंहटाएं
  5. अनमोल है यह कृति . आदरणीय शास्त्री जी के काव्य कौशल से तो परिचित हैं पर यह अनौखा रप है बाल सुलभ . अनीता जी की प्रस्तुति ने जिज्ञासा बढ़ादी है . यह पुस्तक कहाँ मिलेगी .

    जवाब देंहटाएं
  6. शास्त्री सर की ये कृति बच्चों के लिए अमूल्य धरोहर हैं,बहुत ही सुंदर समीक्षा प्रिय अनीता जी

    जवाब देंहटाएं

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