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सोमवार, 20 जुलाई 2020

ग़ज़ल "बताता जमा-खर्च, खाता-बही है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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ये भी सही और वो भी सही है
हारे का हथियार केवल यही है।
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लबों ने सहारा लिया है कहन में
कहावत के जरिये ही बातें कही है
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चलें सिंह-शायर अलग राह अपनी
गंगा बनारस में उलटी बही है
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वही बन गया आदमी दोजहाँ में
हिदायत बुजुर्गों की जिसने सही है
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जो लिक्खा नहीं मायने क्या है उसके
बताता जमा-खर्च, खाता-बही है
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हकीकत से मत अपना दामन बचाना
न जमती फटे दूध से तो दही है
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कमजोर बुनियाद पर जो बनी है
झटकों से वो ही इमारत ढही है
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नहीं रूप से जंग लड़ना है मुमकिन
अदाओं की अपनी रवायत रही है
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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर बहुत खूब
    आपकी रचनाएं बहुत खुबसरत है
    हाल ही में मैंने ब्लॉगर ज्वाइन किया है आपसे निवेदन है कि आप मेरी कविताओं को पढ़े और मुझे सही दिशा निर्देश दे
    https://shrikrishna444.blogspot.com/?m=1
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (21 -7 -2020 ) को शब्द ही शिव हैं( चर्चा अंक 3769) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
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    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  3. हकीकत से मत अपना दामन बचाना
    न जमती फटे दूध से तो दही है

    एकदम सही... बहुत अच्छी रचना
    शुभकामनाएं आदरणीय 💐🙏

    जवाब देंहटाएं

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