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शनिवार, 16 जनवरी 2021

दोहे "चला दिया है तीर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 

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अपने ही जब पीठ पर, करते सतत प्रहार।

बैरी की उसको नहीं, दुनिया में दरकार।।
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जिनकी जिह्वा दो मुखी, समझो उनको सर्प।
वो करते हैं बेवजह, अपने विष पर दर्प।।
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राम रतन की है नहीं, जिनको कोई चाह।
लेकिन करते जा रहे, बेशर्मी से वाह।।
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राहत में देखा बहुत, जब छल का व्यापार।
होकर सजग सुजान ने, छोड़ दिया वो द्वार।।
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जहाँ मान के नाम पर, मिलता हो अपमान।
उस दर पर जाना नहीं, कभी माँगने दान।।
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समझदार के है लिए, दोहों में ये बात।
बता दीजिए नीच को, उसकी क्या औकात।।
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टोका-टाकी का रहा, जिनका हो सिद्धान्त।
उनको लगते हैं बुरे, श्याम सलोने कान्त।।

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सीधी करता मार जो, वो होता है वीर।

चाहे हो परिणाम कुछ, चला दिया है तीर।।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. राहत में देखा बहुत, जब छल का व्यापार।
    होकर सजग सुजान ने, छोड़ दिया वो द्वार।।

    सुंदर ज्ञान देते दोहे....

    जवाब देंहटाएं
  2. जहाँ मान के नाम पर, मिलता हो अपमान।
    उस दर पर जाना नहीं, कभी माँगने दान।।

    आदरणीय, बहुत सुंदर नीतिपरक दोहे
    सादर नमन 🙏

    जवाब देंहटाएं
  3. वन्दन

    सीधी करता मार जो, वो होता है वीर।
    चाहे हो परिणाम कुछ, चला दिया है तीर।

    सत्य कथन

    जवाब देंहटाएं
  4. उत्कृष्ट सार्थक दोहे आ0

    जवाब देंहटाएं

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