"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

फ़ॉलोअर

गुरुवार, 21 जनवरी 2021

गीतिका "रिवाज़-रीत बन गये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--

फूल हो गये ज़ुदाशूल मीत बन गये
भाव हो गये ख़ुदा, बोल गीत बन गये
--
काफ़िला बना नहीं, पथ कभी मिला नहीं
वर्तमान थे कभी, अब अतीत बन गये
--
देह थी नवल-नवल, पंक में खिला कमल
तोतली ज़ुबान की, बातचीत बन गये
--
सभ्यता के फेर में, गन्दगी के ढेर में
मज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये
--
आइना कमाल है, 'रूप' इन्द्रज़ाल है
धूप और छाँव में, रिवाज़-रीत बन गये

--

16 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 22-01-2021) को "धूप और छाँव में, रिवाज़-रीत बन गये"(चर्चा अंक- 3954) पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.

    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
  2. सभ्यता के फेर में, गन्दगी के ढेर में
    मज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये
    --
    आइना कमाल है, 'रूप' इन्द्रज़ाल है
    धूप और छाँव में, रिवाज़-रीत बन गये

    बेहतरीन.. हिन्दी ग़ज़ल... या चाहे गीतिका कह लें...
    कमाल की पंक्तियां हैं। साधुवाद आदरणीय शास्त्री जी 🙏
    हार्दिक शुभकामनाओं सहित,
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं
  3. फूल हो गये ज़ुदा, शूल मीत बन गये
    भाव हो गये ख़ुदा, बोल गीत बन गये
    --
    काफ़िला बना नहीं, पथ कभी मिला नहीं
    वर्तमान थे कभी, अब अतीत बन गये
    --
    देह थी नवल-नवल, पंक में खिला कमल
    तोतली ज़ुबान की, बातचीत बन गये

    दुर्लभ रचना।
    अति सुन्दर।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं
  4. सभ्यता के फेर में, गन्दगी के ढेर में
    मज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये
    --
    आइना कमाल है, 'रूप' इन्द्रज़ाल है
    धूप और छाँव में, रिवाज़-रीत बन गये

    यथार्थ का हृदयग्राही चित्रण...
    आपकी लेखनी को नमन 🌹🙏🌹
    -डॉ शरद सिंह

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति आदरणीय 👌👌

    जवाब देंहटाएं
  6. प्रणाम शास्त्री जी, सदैव की भांत‍ि आपके दोहे ....कम शब्दों में संसार समेट लेते हैं...सभ्यता के फेर में, गन्दगी के ढेर में

    मज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये



    आइना कमाल है, 'रूप' इन्द्रज़ाल है

    धूप और छाँव में, रिवाज़-रीत बन गये...वाह

    जवाब देंहटाएं
  7. सभ्यता के फेर में, गन्दगी के ढेर में
    मज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये
    वाह!!!
    हमेशा की तरह बहुत ही लाजवाब गीत।

    जवाब देंहटाएं
  8. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार (20-08-2021) को "जड़ें मिट्‌टी में लगती हैं" (चर्चा अंक- 4162) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद सहित।

    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
  9. प्रणाम! गीतिका की गेयता हृदय तक को गूंजा रही है । अति सुन्दर ।

    जवाब देंहटाएं
  10. बहुत सुंदर सारगर्भित सृजन।

    जवाब देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails