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शनिवार, 30 जनवरी 2021

दोहे "राजनीति में हंस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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सारे कौए हो गये, राजनीति में हंस।
बाहर से गोपाल हैं, भीतर से हैं कंस।।

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मक्कारों ने हर लिया, जनता का आराम।

बगुलों ने टोपी लगा, जीना किया हराम।।

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जब से दल-बल में बढ़ी, शैतानों की माँग।
मुर्गे पढ़ें नमाज को, गुर्गे देते बाँग।।
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खिचड़ी देती है मज़ा, कंकड़ देते कष्ट।
रसना के आनन्द को, कर देते है नष्ट।।
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नहीं हुआ है देश में, अभी शीत का अन्त।
कुहरे से इस साल तो, शीतल हुआ बसन्त।।
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बिना भूमिका के कहो, अपने मन की बात।
दोहों में ही निहित है, जीवन की सौगात।।
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पल-पल में है बदलता, आसमान का रूप।
बादल छँटने पर खिले, वसुन्धरा पर धूप।।

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दुनिया का तो छोर है, नहीं व्योम का अन्त।
अन्तरिक्ष में घूमता, कालातीत बसन्त।।
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6 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय शास्त्री जी,
    यह कहावत निवेदित करना चाहूंगी...
    जहां न जाए रवि,
    वहां जाए कवि
    इस कहावत में यह भी मैं जोड़ना चाहती हूं...
    जहां न जाए कवि
    वहां जाएं शास्त्री जी

    जी हां, आपकी पैनी दृष्टि का कोई सानी नहीं,
    बहुत अच्छे दोहों के लिए नमन 🙏
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं
  2. सारे कौए हो गये, राजनीति में हंस।
    बाहर से गोपाल हैं, भीतर से हैं कंस।।
    --
    मक्कारों ने हर लिया, जनता का आराम।
    बगुलों ने टोपी लगा, जीना किया हराम।।
    --
    जब से दल-बल में बढ़ी, शैतानों की माँग।
    मुर्गे पढ़ें नमाज को, गुर्गे देते बाँग।।

    सच ऐसे ही लोग देश का मटियामेट करने में पीछे नहीं रहते हैं


    चिंतनशील सामयिक रचना

    जवाब देंहटाएं
  3. सटीक प्रहार करते हुए सार्थक दोहे आ0

    जवाब देंहटाएं
  4. दोहे लिखने का प्रयास मैं भी करूँगा।आपके सुंदर दोहे देखकर प्रेरणा मिली

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर दोहे आदरणीया वर्षा जी के कथन से सहमत हूँ । आप बहुत सुन्दर लिखते हैं सर नमन आपके सृजनशीलता को🙏

    जवाब देंहटाएं

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