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बुधवार, 20 जनवरी 2021

नवगीत "पर्वत बन कर डटे रहेंगे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

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अडिग रहे हैं, अडिग रहेंगे
सदा बढ़े हैं, सदा बढ़ेंगे!
हम तो दरिया का पानी है
रुककर हम तो नहीं सड़ेंगे!!
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कितनों ने सन्देशे भेजे
कितनों से भिजवाये गये
कितनों ने आकर धमकाया
कितनों ने जमकर फुसलाया
हम भारत के हैं बाशिन्दे
पर्वत बन कर डटे रहेंगे!
हम तो दरिया का पानी है
रुककर हम तो नहीं सड़ेंगे!!
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हममें गहराई सागर की
चाह नही हमको गागर की
काँटों पर हम चलने वाले
हम अपनी धुन के मतवाले
हम जमकर के लोहा लेंगे
दुश्मन से हम नही डरेंगे!
हम तो दरिया का पानी है
रुककर हम तो नहीं सड़ेंगे!!

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10 टिप्‍पणियां:

  1. ओज सम्पन्न भावपूर्ण सृजन ।

    जवाब देंहटाएं
  2. वीररस से ओतप्रोत रचना

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 21.01.2021 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा| आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  4. जोशपूर्ण रचना सार्थक संदेश देती हुई..

    जवाब देंहटाएं
  5. अद्भुत!
    वीर रस से ओतप्रोत मन में जोश जगाने वाली रचना।
    सादर नमन।

    जवाब देंहटाएं
  6. हम तो दरिया का पानी है
    रुककर हम तो नहीं सड़ेंगे!!

    सचमुच बहता पानी कभी सड़ता नहीं।
    हृदय को जोश से भर देने वाली इस रचना हेतु बधाई 🙏

    वंदन
    अभिनंदन
    आदरणीय शास्त्री जी 🙏

    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं

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