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शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

गीत "खुशियों की डोरी से नभ में अपनी पतंग उड़ाओ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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धनु से मकर लग्न में सूरज, आज धरा पर आया।
गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।
गंगा जी के तट पर, अपनी खिचड़ी खूब पकाओ,
खिचड़ी खाने से पहले, तुम तन-मन शुद्ध बनाओ,
आसमान में खुली धूप को सूरज लेकर आया।
गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।
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स्वागत करो बसन्त ऋतु का, जीवन में रस घोलो,
तिल-चौलाई के लड्डू को खाकर मीठा बोलो,
इस अवसर पर सबके मन में है उल्लास समाया।
गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।
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खुशियों की डोरी से नभ में अपनी पतंग उड़ाओ,
मन में भरकर जोश जीत का जमकर पेंच लड़ाओ,
झुण्ड पंछियों का नभ में, यह खेल देखने आया।
गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।
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कुछ दिन में ध्वज फहरायेंगे, भारतभाग्यविधाता,
प्यारा सा गणतन्त्रदिवस भी इसी माह में आता,
पर्व सलोना त्यौहारों की गठरी को संग लाया।
गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।
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9 टिप्‍पणियां:

  1. त्योहारों ka उल्लेख करती एवं उल्लास भरती समसामयिक मनोहारी कृति..

    जवाब देंहटाएं
  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार(१६-०१-२०२१) को 'ख़्वाहिश'(चर्चा अंक- ३९४८) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  3. बेहतरीन और लाजवाब गीत ।

    जवाब देंहटाएं
  4. बेहतरीन प्रस्तुति आदरणीय

    जवाब देंहटाएं
  5. मकरसंक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🌷🙏

    जवाब देंहटाएं
  6. प्रभावशाली लेखन शैली मुग्ध करती हुई - - साधुवाद आदरणीय। मकरसंक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं - -

    जवाब देंहटाएं

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