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शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

गीत ''मकर का सूरज'' (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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कुहासे का आवरण
, आकाश पर चढ़ने लगा।।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।।
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हाथ ठिठुरे-पाँव ठिठुरे, काँपता आँगन-सदन,
कोट,चस्टर और कम्बल से ढके सबके बदन,
आग का गोला शरद में पस्त सा  पड़ने लगा।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।।
--
सर्द मौसम को समेटे, जागता परिवेश है,
श्वेत चादर को लपेटे, झाँकता रजनीश है,
गगन के नयनों से शीतल अश्रुजल झड़ने लगा।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।।
--
आगमन ऋतुराज का लगता बहुत ही दूर है,
अभी तो हेमन्त यौवन से बहुत भरपूर है,
मकर का सूरज नये सन्देश को गढ़ने लगा।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार(२३-०१-२०२१) को 'टीस'(चर्चा अंक-३९५५ ) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. आगमन ऋतुराज का लगता बहुत ही दूर है,
    अभी तो हेमन्त यौवन से बहुत भरपूर है,
    मकर का सूरज नये सन्देश को गढ़ने लगा।

    सुंदर पंक्तियां...
    प्रकृति का मनोहारी चित्रण....

    आदरणीय, साधुवाद 🙏
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं
  3. शरद ऋतु के शीतलता का मनोहारी चित्रण करता हुआ बहुत सुंदर समसामयिक गीत..

    जवाब देंहटाएं
  4. सुंदर स्वागत गीत मधुर सरस ।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत ही सुन्दर और सरस रचना

    जवाब देंहटाएं
  6. हाथ ठिठुरे-पाँव ठिठुरे, काँपता आँगन-सदन,
    कोट,चस्टर और कम्बल से ढके सबके बदन,

    शीतकाल का यथार्थ चित्रण...
    बहुत सुंदर रचना...
    सादर नमन 🌹🙏🌹
    - डॉ शरद सिंह

    जवाब देंहटाएं

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