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रविवार, 31 जनवरी 2021

कविता "अब बसन्त आयेगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खिल जायेंगे नव सुमन
,
उपवन मुस्कायेगा!!
--
कुहासे की चादर,
धरा पर बिछी हुई।
नभ ने ढाँप ली है,
अमल-धवल रुई।।
--
दिवस हैं अभी छोटे,
रोशनी मऩ्द है।
शीत की मार है,
विद्यालय बन्द है।।
--
जल रहे हैं अलाव,
आँगन चौराहों पर।
चहल-पहल कम है,
पगदण्डी-राहों पर।।
--
सूरज अदृश्य है,
पड़ रहा पाला है।।
पर्वत ने ओढ़ लिया,
बर्फ का दुशाला है।।
--
मन में एक आशा है,
अब बसन्त आयेगा!
खिल जायेंगे नव सुमन,
उपवन मुस्कायेगा!!
--

12 टिप्‍पणियां:

  1. "मन में एक आशा है,
    अब बसन्त आयेगा!"
    .
    बहुत अच्छी अभिलाषा सर!

    जवाब देंहटाएं
  2. मन में एक आशा है,
    अब बसन्त आयेगा!
    खिल जायेंगे नव सुमन,
    उपवन मुस्कायेगा!!

    आमीन !!!!!

    सुंदर, आशावादी गीत...
    आदरणीय अनंत शुभकामनाओं सहित
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं
  3. खिल जायेंगे नव सुमन, उपवन मुस्कायेगा; वह समय भी आएगा

    जवाब देंहटाएं
  4. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार 01 फ़रवरी 2021 को 'अब बसन्त आएगा' (चर्चा अंक 3964) पर भी होगी।--
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव


    जवाब देंहटाएं
  5. उत्तर
    1. वाह!
      सुंदर,भावपूर्ण,उत्कृष्ट रचना माननीय।
      सादर नमन।

      हटाएं
  6. शीतांत में आहट सुनाई देने लगती है - दूर नहीं है अब वसंत.

    जवाब देंहटाएं
  7. वाह! बहुत सुंदर।
    पर्वतों के दुशाले अब पिघलने लगे हैं,कोहरे भी तो छंटने लगे हैं
    सच अब बसंत आयेगा।
    अप्रतिम रचना।

    जवाब देंहटाएं
  8. सूरज अदृश्य है,
    पड़ रहा पाला है।।
    पर्वत ने ओढ़ लिया,
    बर्फ का दुशाला है।।

    वाह! अत्यंत सुंदर उपमाएं...
    सादर नमन आदरणीय 🙏🌹🙏
    - डॉ शरद सिंह

    जवाब देंहटाएं

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