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मंगलवार, 9 मार्च 2021

ग़ज़ल "नई गंगा बहाना चाहता हूँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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स्वर्ग धरती को बनाना चाहता हूँ
और इक सूरज उगाना चाहता हूँ
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इक नई गंगा बहाना चाहता हूँ
प्यास धरती की बुझाना चाहता हूँ
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पर्यावरण अपना बचाने के लिए
पेड़ धरती पर लगाना चाहता हूँ
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चल रहा हूँ मैं कँटीली राह पर
मुकद्दर आजमाना चाहता हूँ
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भूल बैठे जो अमन की राह को
रास्ता उनको बताना चाहता हूँ
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खोलकर मक़तब शहर में-गाँव में
अब जहालत को मिटाना चाहता हूँ
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पाक का नापाक नक्शा मेटकर
एक भारत को बनाना चाहता हूँ
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राह से भटके हुए आवाम को
देशभक्ति को सिखाना चाहता हूँ
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जो गुलामी के बचे बाकी निशां
दाग सारे मेटना अब चाहता हूँ
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देश पर कुर्बान करके जिन्दगी
हैसियत अपनी लुटाना चाहता हूँ
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सभ्यता का आवरण मैला हुआ
अब सुहाना 'रूप' लाना चाहता हूँ

11 टिप्‍पणियां:

  1. थोड़ी सी अशांति के बदले व्यापक शान्ति के लिए नक्से खिंचे गए थे कभी।
    खैर सुंदर रचना।
    नई रचना

    जवाब देंहटाएं
  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (10-3-21) को "नई गंगा बहाना चाहता हूँ" (चर्चा अंक- 4,001) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  3. Very Nice your all post. i love so many & more thoughts i read your post its very good post and images . thank you for sharing

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह! बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना..

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत बहुत सुन्दर सराहनीय रचना |

    जवाब देंहटाएं
  6. स्वर्ग धरती को बनाना चाहता हूँ
    वाह!!!
    बहुत ही लाजवाब सृजन।

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत ही शानदार ग़ज़ल।आपको हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं

    जवाब देंहटाएं

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